नारी के सम्मान में नारी की बात, क्यूंकि मैं इक्कीसवीं सदी की नारी हूँ

Share this

पाखण्डों का वध करने के लिए- मैं खड्गधारिणी काली हूँ । संसार में नारी शक्ति को जगाने के लिए- मैं दश प्रहरणधारिणी दुर्गा हूँ । संसार को सुशोभन बनाने के लिए- मैं लक्ष्मी हूँ । जगत में विद्या वितरण के लिए- मैं सरस्वती हूँ । सहिष्णुता के गुण से- मैं धरणी हूँ । सबकी आश्रयदायिनी होने से- आकाश हूँ । सबकी जीवनदायिनी होने से और सबको रससिक्त करने वाली– मैं वायु हूँ और जल भी हूँ । प्रकाश के कारण दूसरों को अपना बनाने वाली होने से मैं ज्योति हूँ, और सबको धारण करने से- मैं माटी हूँ । क्योंकि मैं माँ हूँ केवल माँ हूँ ।

मेरे धर्म के विषय में मतभेद मतान्तर नहीं है । मेरा धर्म है नारीत्व, मातृत्व। मुझ में जातिभेद जनित कोई चिन्ह नहीं है। सम्पूर्ण नारी जाति मेरी जाति है । मैं सबसे अधिक छोटा बनना जानती हूँ परन्तु मैं बड़ी स्वाभिमानी हूँ । मेरे भय से त्रिभुवन काँपता है । मैं जो चाहती हूँ, वही पाती हूँ, तो भी मेरा मान जगत प्रसिद्ध है ।

पुरुष कामुक है इसलिए वह अपने ही समान मानकर मुझको कामिनी कहता है । पुरुष दुर्बल है, सहज ही विभक्त हो जाता है, इसी से मुझे दारा कहता है । मैं सब कुछ सहती हूँ, क्योंकि मैं सहना जानती हूँ । मैं मनुष्य को गोद में खिलाकर मनुष्य बनाती हूँ, उसके शरीर की धूलि से अपना शरीर मैला करती हूँ, इसलिए कि मैं यह सब सह सकती हूँ । रामायण और महाभारत में मेरी ही कथाएं हैं । इनमें मेरा ही गान हुआ है । यही कारण है जगत को और जगत के लोगों को जीवन विद्या का शिक्षण देने में इनके समान अन्य कोई भी ग्रन्थ समर्थ नहीं हुआ । मैं दूसरी भाषा सीखती हूँ, परन्तु बोलती हूँ अपनी ही भाषा और मेरी सन्तान इसलिए उसे गौरव के साथ मातृभाषा कहती है । मुझको क्या पहचान लिया है ? नहीं पहचाना, तो फिर पहचान लो । मैं नारी हूँ, इक्कीसवीं सदी में अपना प्रभुत्व लेकर आ रही हूँ ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *