या देवी सर्वभू‍तेषु मनोकामनापूर्तियै संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:

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चैत्र नवरात्र के पांचवें दिन सर्व मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाली माँ दुर्गा के स्कंदमाता स्वरूप की पूजा उपासना करने का दिन माना जाता है । स्कंदमाता सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनका उपासक अलौकिक तेज एवं कांति से संपन्न हो जाता है । अगर नवरात्रि काल में स्कंदमाता की स्तुति का दिन में तीन बार पाठ करने से एक दो नहीं बल्की सैकड़ों मनोकामनाएं माता पूरी कर देती हैं ।

माता का षोडषोपचार या पंचोपचार पूजन करने के बाद स्कंदमाता की नीचे दी गई स्तुति का पाठ श्रद्धा पूर्वक करें ।

इस मंत्र से माता का ध्यान करें-
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रित करद्वया ।
शुभदास्तु सदा देवी स्कंद माता यशस्विनी ।।
वंदे वांछित कामार्थे चंद्रार्धकृतशेखराम् ।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा स्कंदमाता यशस्वनीम् ।।

धवलवर्णा विशुद्ध चक्रस्थितों पंचम दुर्गा त्रिनेत्रम् ।
अभय पद्म युग्म करां दक्षिण उरू पुत्रधराम् भजेम् ।।
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानांलकार भूषिताम् ।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल धारिणीम् ।।

प्रफुल्लवंदना पल्लवांधरा कांत कपोला पीन पयोधराम् ।
कमनीया लावण्या चारू त्रिवली नितम्बनीम् ।।

।। इस रक्षा कवच का पाठ करने से सदैव रक्षा होती हैं ।।

ऐं बीजालिंका देवी पदयुग्मघरापरा
हृदयं पातु सा देवी कार्तिकेययुता !

श्री हीं हुं देवी पर्वस्या पातु सर्वदा
सर्वाग में सदा पातु स्कन्धमाता पुत्रप्रदा !

वाणंवपणमृते हुं फ्ट बीज समन्विता
उत्तरस्या तथाग्नेव वारुणे नैॠ तेअवतु !

इन्द्राणां भैरवी चैवासितांगी च संहारिणी
सर्वदा पातु मां देवी चान्यान्यासु हि दिक्षु वै !!

अंत मे क्षमा याचना के बाद आरती करें एवं प्रसाद वितरण करें !
।। ॐ नमश्चंडिकाये ॐ ।।
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इन मंत्रों से स्कंदमाता की स्तुति करें-
नमामि स्कन्धमातास्कन्धधारिणीम्
समग्रतत्वसागरमपारपारगहराम्घ्
शिप्रभांसमुल्वलांस्फुरच्छशागशेखराम् !
ललाटरत्नभास्कराजगतप्रदीप्तभास्कराम्घ्
महेन्द्रकश्यपाद्दचतांसनत्कुमारसंस्तुताम् !
सुरासेरेन्द्रवन्दितांयथार्थनिर्मलादभुताम्घ्
मुमुक्षुभिद्दवचिन्तितांविशेषतत्वमूचिताम् !
नानालंकारभूषितांकृगेन्द्रवाहनाग्रताम् !
सुशुद्धतत्वातोषणांत्रिवेदमारभषणाम्
सुधाद्दमककौपकारिणीसुरेन्द्रवैरिघातिनीम्घ्
शुभांपुष्पमालिनीसुवर्णकल्पशाखिनीम् !
तमोअन्कारयामिनीशिवस्वभावकामिनीम्घ्
सहस्त्रसूर्यराजिकांधनच्जयोग्रकारिकाम् !
सुशुद्धकाल कन्दलांसुभृडकृन्दमच्जुलाम्घ्
प्रजायिनीप्रजावती नमामिमातरंसतीम् !
स्वकर्मधारणेगतिंहरिप्रयच्छपार्वतीम्घ्
इनन्तशक्तिकान्तिदांयशोथमुक्तिदाम् !
पुनरूपुनर्जगद्धितांनमाम्यहंसुराद्दचतामघ्
जयेश्वरित्रिलाचनेप्रसीददेवि पाहिमाम्घ्
कवच ऐं बीजालिंकादेवी पदयुग्मधरापरा !
हृदयंपातुसा देवी कातिकययुताघ्
श्रींहीं हुं ऐं देवी पूर्वस्यांपातुसर्वदा !
सर्वाग में सदा पातुस्कन्धमातापुत्रप्रदाघ्
वाणवाणामृतेहुं फट् बीज समन्विता !
उत्तरस्यातथाग्नेचवारूणेनेत्रतेअवतुघ्
इन्द्राणी भैरवी चौवासितांगीचसंहारिणी !
उपासना मंत्र
सिंहासानगता नितयं पद्माश्रितकरद्वया !
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी !!
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