लहसुनिया रत्न के प्रभाव से मिलती है केतु ग्रह के अशुभ प्रभाव से मुक्ति

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वैदिक ज्योतिष में केतु ग्रह को छाया ग्रह के रूप में लोग जानते है। केतु ग्रह के अशुभ प्रभाव को मानव जीवन से दूर करने के लिए ही केतु ग्रह का रत्न लहसुनिया धारण किया जाता है इस रत्न को अंग्रेजी में कैट्स आई, उर्दू में लहसुनिया, संस्कृत में वैदुर्य, विदुर, बाल सूर्य कहते है। इस रत्न में सफेद या धूम्र रंग की धारियाँ पाई जाती है। यह रत्न श्रीलंका तथा काबुल के अलावा भारत के हिमाचल, विन्ध्याचल के कुछ क्षेत्र में पाया जाता है।

लहसुनिया क्यों धारण करें 

कार्य में आनेवाली रुकावटें दूर करने के लिए

किसी भी जातक की कुंडली में केतु ग्रह अशुभ भाव में हो तो व्यक्ति के कार्य में रुकावटें आनी निश्चित है। इस परिस्थिति में जातक को लहसुनिया रत्न धारण करना चाहिए, इस रत्न के प्रभाव से कार्य में आने वाली रुकावटें दूर हो जाती है।

दुर्घटनाओं से बचाव

अगर आपके साथ कभी भी छोटी-मोटी दुर्घटना होती रहती है, या दुर्घटना होने का डर मन में बसा हुआ है, चोट आदि लगती रहती है, इसका मतलब आपकी कुंडली में केतु अशुभ भाव में बैठे है, जिसके प्रभाव से आपको इसतरह की स्थिति का सामना करना पड रहा है, ऐसी स्थिति में आपको लहसुनिया रत्न धारण करना चाहिए ताकि दुर्घटना आदि से आपका बचाव हो सके।

डरावने सपने नहीं आते

जब किसी जातक की कुंडली में केतु अशुभ हो तो जातक को नींद में डरने की बीमारी का सामना करना पड़ता है या जातक नींद में ही बुरे सपने देखने लगता है। डर के मारे नींद में चीखे निकलने लगती है, अगर आप भी ऐसी स्थिति से गुजर रहे है, तो बिना किसी डर के आप लहसुनिया रत्न धारण कर इस तरह की परेशानी से मुक्ति पा सकते है।

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बुरी नजर से बचाव

कई बार देखा गया है की छोटे बच्चे हो या बड़े कभी कभी हमें नजरदोष का सामना करना पड़ता है। दूसरों की बुरी नजर लगती है जिसके कारण स्वास्थ्य पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है तथा जातक चिडचिडा हो जाता है, इसका भी कारण कुंडली में केतु का अशुभ होना ही माना जाता है। ऐसी स्थिति में आप लहसुनिया रत्न धारण कर इस तरह की परेशानी से मुक्ति पा सकते है।

लहसुनिया कब धारण करें

लहसुनिया बुधवार या मंगलवार के दिन या बुध या मंगल की होरा में शुल्क पक्ष में धारण करना शुभ होता है। नक्षत्र- अश्विनी, मघा या मूल नक्षत्र में लहसुनिया धारण करना शुभ होता है। इसे चांदी या पंचधातु में धारण किया जाता है।

किस अंगूली में धारण करें

इस रत्न को सीधे हाथ की कनिष्ठा अंगूली में धारण करना चाहिए। यह रत्न कम से कम 5 रत्ति का अवश्य होना चाहिए, इस रत्न को धारण करने से पहले केतु के बीज मन्त्र द्वारा इस रत्न को अभिमंत्रित जरुर करना चाहिए, ताकि इसके शुभ फल जल्दी जातक को मिले। 

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